अप्रैल चालू हुआ और उसके साथ उसके fool भी.... महा मुर्ख दिवस... लोगो को मुर्ख बनाओ या खुद बन जाओ पर हम चाहे मुर्ख बनाये न बनाये हम हमेशा मुर्ख ही रहेंगे. पता नही जिंदगी हमे पागल बनती है या हम जिंदगी को.........बचपन में हमारी मुर्खता को बचपना कह के ताल दिया जाता था और फिर जब और बड़े हुए तो कहा जवानी में गलतिय तो होती है फिर बुदापे में लोग सठिया जाते है तो हमारी मुर्खता हमारी म्रत्यु के साथ ही हमारा पिचा छोडती है.जब हम दुसरो को पागल बना रहे होते है तो नही जानते असल में हम खुद पागल बन रहे होते है.
हम जीवन भर जब पागल बने रहते है तो फिर ये १ दिन हमारे लिए स्पेशल क्यों बनवाया है भाई ...........कभी दुसरो से आगे बड़ने की जिद...तो कभी सब कुछ पाने का खयाब...तो कभी दोस्तों से जूठ तो कभी प्यार के लिए किसी को मुर्ख बनाना.......
लोग कहते है दुसरो को मुर्ख बनाना भी एक कला है एक आर्ट है .पर ये एक ऐसी कला है जिसमे आप जो दुसरो के साथ कर रहे होते हो वो ही खुद के साथ हो रहा होता है. यानि आप बेवकूफ बनाते हो दुसरे को पर असल में खुद बन रहे होते हो..........
वैसे इन्सान को जो मज़ा दुसरो को मुर्ख बनाने में आता है वो मज़ा और किसी में कहा .लोगो को अपनी उंगलियों पे नाचना.....
पर किसी और की उंगलियों पे हम खुद नाच रहे होते है और ये हम नही जानते...वैसे मेने कही पड़ा था इन संसार में २ ही लोग खुश है १ बच्चा और दूसरा पागल..
तो आइये हम सब पागल कसम खाते है की हम सब पागल .....पागल थे .....पागल है और पागल(मुर्ख) बने रहेंगे.............
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